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कोरोना का कहरः दुनियाभर के 26 करोड़ बच्चे कभी नहीं जा पाएंगे स्कूल

दिल्ली डेस्क

प्रखर प्रहरी

दिल्लीः कोरोना वायरस का सबसे बुरा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ा है। इसके कारण  पिछले पांच  महीने से दुनियाभर के अधिकतर स्कूल-कॉलेज बंद हैं। बात भारत की करें तो सरकार ने भी 30 सितंबर तक स्कूल-कॉलेजों को बंद रखने का फैसला किया है। कई राज्यों सरकारों ने स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाई शुरू करने को लेकर अपने सुझाव दिए हैं। महाराष्ट्र सरकार ने जहां केंद्र सरकार को जनवरी 2021 से स्कूल और कॉलेज खोलने सुझाव दिया, तो ओडिशा ने दशहरे तक स्कूल-कॉलेज बंद रखने का फैसला किया है, बाकी राज्यों में भी कमोबेश यही स्थिति है।

कोविड-19 की रोकथान के लिए लागू लॉकडाउन के दौरान पढ़ाई प्रभावित न हो इसलिए कई देशों ने रिमोट लर्निंग सिस्टम या ऑनलाइन क्लासेज की व्यवस्था की। छात्रों को मोबाइल, टीवी और रेडियो के माध्यम  पढ़ाया जा रहा है, लेकिन यह व्यवस्था भी कारगर साबित नहीं हो रही है क्योंकि बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे हैं जिनके पास ऑनलाइन क्लास की सुविधा नहीं है। उनके पास मोबाइल और टीवी नहीं है, विशेषकर गांवों में। गावों में यदि मोबाइल है भी, तो इंटरनेट नहीं है। कई इलाकों में मोबाइल चार्ज करने के लिए बिजली भी नहीं है।

हाल ही में यूनिसेफ यानी संयुक्त राष्ट्र बाल कोष, यूनेस्को यानी संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक, वैज्ञानिक, एवं सांस्कृतिक संगठन और वर्ल्ड बैंक यानी विश्व बैंक ने संयुक्त रूप से एक रिपोर्ट प्रस्तुत की है, जिसमें दावा किया गया है कि दुनियाभर में कोरोना से लगभग 150 करोड़ छात्र प्रभावित हुए हैं। इनमें से 47 करोड़ छात्र यानी 31 प्रतिशत छात्र की पढ़ाई नहीं हो पा रही है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि ईस्ट अफ्रीका और साउथ अफ्रीका में 49 फीसदी छात्रों को ऑनलाइन एजुकेशन की सुविधा नहीं मिल पा रही है। हालांकि लैटिन अमेरिका में स्थिति जरूर बेहतर है। वहां लगभग नौ फीसदी ही छात्र ही इस सुविधा से वंचित हैं।

दुनियाभर के 110 देशों में प्री प्राइमरी, प्राइमरी और अपर क्लासेस के बच्चों की बढ़ाई को लेकर यह सर्वे किया गया है। सर्वे में पाया गया है कि इंटरनेट के माध्यम से पढ़ाई करने वाले स्टूडेंट्स की संख्या टीवी और रेडियो के जरिये पढ़ने वालों से अधिक है। सर्वे में पाया गया कि प्री प्राइमरी में 42 फीसदी, प्राइमरी में 74 फीसदी और अपर सेकेंडरी लेवल पर 77 फीसदी स्टूडेंट्स इंटरनेट के जरिए पढ़ाई कर रहे हैं।

वहीं ऑनलाइन पढ़ाई का फायदा शहरी क्षेत्रों के बच्चे तो उठा रहे हैं, लेकिन गांवों में कम ही बच्चों तक ये सुविधा पहुंच पा रही है। रिपोर्ट के अनुसार गांवों में हर चार में से तीन बच्चे ऑनलाइन एजुकेशन से दूर हैं। इसमें गरीब तबके के बच्चे ज्यादा हैं। कम आय वाले देशों में 47 फीसदी और मध्यम आय वाले देशों में 74 फीसदी बच्चे कोरोना की वजह से एजुकेशन से दूर हो गए हैं। भारत की बात करें तो यहां कोरोना की वजह से लगभ 15 लाख स्कूल बंद हुए हैं। इनमें 28 करोड़ बच्चे पढ़ते हैं,इनमें 49 फीसदी लड़कियां हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में सिर्फ 24 फीसदी घरों में ही ऑनलाइन एजुकेशन की सुविधा उपलब्ध है।

वहीं, एनसीईआरटी यानी राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 27 फीसदी छात्रों के पास मोबाइल या लैपटॉप नहीं है। 28 फीसदी बच्चों के पास फोन चार्ज करने के लिए बिजली नहीं है। इसके अलावा जिनके पास ऑनलाइन एजुकेशन की सुविधा है, उन्हें भी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। एनसीईआरटी द्वारा कराए गए सर्वे के दौरान 33 फीसदी बच्चों ने बताया कि वे अपनी पढ़ाई पर ध्यान नहीं कर पा रहे हैं, जबकि कई ऐसे बच्चे हैं जिन्हें विज्ञान और गणित विषण में ज्यादा दिक्ककत आ रही है। ऑनलाइन क्लासेज के दौरान डाउट्स क्लियर नहीं हो पा रहे हैं।

इस महामारी के समय में बड़ी संख्या में नौकरियां गई हैं। लोगों के व्यापार बंद हुए हैं। इसका सीधा असर एजुकेशन पर भी पड़ा है। अप्रैल में एजुकेशन को लेकर यूनेस्को की एक रिपोर्ट आई थी, जिसमें कहा गया था कि कोरोना के चलते दुनियाभर के करीब एक करोड़ बच्चे कभी स्कूल नहीं जा पाएंगे। एक रिपोर्ट के अनुसार कोरोना से पहले दुनियाभर 25 करोड़ बच्चे से शिक्षा से वंचित थे। इस तरह अब 26 करोड़ बच्चे कभी स्कूल जाने की स्थिति में नहीं होंगे।

यदि स्कूल-कॉलेज खोल दिए जाए तो इन समस्याओं से छुटकारा मिल सकता है, लेकिन अब सवाल यह है कि क्या इसके लिए स्कूल-कॉलेज तैयार हैं। क्या उनके पास सुविधा हैं। यूनिसेफ और डब्ल्यूएचओ के अनुसार  दुनिया में हर पांच में से दो स्कूलों के पास साफ- सफाई के लिए जरूरी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं।

लगभग 81 करोड़ बच्चों के पास हैंडवाश और सेनिटाइजर नहीं है। इनमें से 35 करोड़ के पास हाथ धोने के लिए साबुन तो है लेकिन 46 करोड़ के पास पानी नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक हर तीन में से एक स्कूल में पीने योग्य पानी की भी व्यवस्था पर्याप्त नहीं है।

 

 

 

 

Shobha Ojha

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